नाराजगी

“नाराजगी” मैं उसके यादों के सपनें सजाता रहा, और वो मुझे शतरंज के बिशात पे भूलाती रही। मैं उसे बेइंतहा प्यार करता रहा, और वो बेपनाह,बेज़ान कहर भरपाती रही। मैं खुद सिगरेट के कश में जलता रहा, और वो कल के शराब की तरह मुझे भूलाती रही। मैं उसे शाम की चादर की तरह ओढ़ता

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बरगद का पेड़!

बरगद का पेड़! – रवि’प्रत्युष’ नारायण सीढ़ियों के नीचे,दिवार के पीछे और गर्दन को मीचे, पिछले छः महीनों से मैं उसे देख रहा था, स्वभाव से शांत,चित्त और थका-हारा सा, शायद वक्त का मारा था। उम्र से दराज़ मग़र,पंक्तियो में सबसे पीछे, ख़याल से अठ्ठाइसवां रह होगा, मग़र चाल में अब भी वो मस्तानी थी,