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बरगद का पेड़!

बरगद का पेड़!

– रवि’प्रत्युष’ नारायण

सीढ़ियों के नीचे,दिवार के पीछे और गर्दन को मीचे,
पिछले छः महीनों से मैं उसे देख रहा था,
स्वभाव से शांत,चित्त और थका-हारा सा,
शायद वक्त का मारा था।

उम्र से दराज़ मग़र,पंक्तियो में सबसे पीछे,
ख़याल से अठ्ठाइसवां रह होगा,
मग़र चाल में अब भी वो मस्तानी थी,
जैसे मानों अभी बाकी उसकी जवानी थी।

 

साथ देने को बस एक-दो छुटपन यार थे,
औऱ कुछ दूर खड़ी एक हमराही का पैगाम था,
पर शायद ये अब भी उससे अंजान था,
जैसे ice age के आखरी मैमथ का मान था।

ये हठीला,खुद से हारा,बेहिसाब हो चला था,
औऱ वो नज़ाकत से भरी,इठलाती,बलखाती इंसान हो चली थी,
शायद वक्त का हीं मार था।

 

वहीं पास में लगती थी अपनी मंडली भी,हम चार थे,
कुछ दूर से वो भी हमें निहारा करता था,पर वह अकेला था,
हम वहीं लंच किया करते,मानो खुशियां बाटां करते थे,
पर वो चुपचाप,अपना बचा दिन काटा करता था,
हम खुश होते और आपस मे शोर किया करते थे,
पर वो हमसे जलते हुए,खुद से हठजोर किया करता था,
शायद वो अंजाने में हमसे परेशान था और खुद से अंजान था।

क्या वो अपने कॉलेज के कोने वाला पुराना,बरगद का पेड़ था!
जो यक़ीनन अब भी अकेले में रोया करता होगा!

जिसकी सिसकियाँ आज भी छोटे-बड़े पैरों तले दब जाती होगी!
जिसका दिल अब भी,वो दूर खड़ी हमराही केे लिए धड़क जाता होगा!
अब भी इसकी सासें,बस उसे देख पल भर को थम जाती होगी?
क्या सच में बरगद का पेड़ भी इश्क़ करता हो

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One thought on “बरगद का पेड़!

  1. Bsdk kya likha h mtlb dil chir liya
    Mera ab khun bah raha h. Koi marham do my khun is pasijh raha hai. Koi roko. Matlab jaan nikaal liya . Maar daala mere ko.

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